(1)
कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर
तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप
प्रभा की धारा से अभिषेक!
प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं |
व्याख्या : एक दिन जब मनु विभिन्न विचारों में लीन थे तब अचानक उन्हें ऐसा जान पड़ा कि कोई उनसे यह कह रहा है—“जिस प्रकार समुद्र की लहरें समुद्र में भीषण उथल-पुथल मचाकर सतह से मणियों को निकालकर फेंक देती हैं उसी प्रकार इस संसार रूपी समुद्र की लहरों अर्थात् सांसारिक आघातों से ठुकराए हुए मणि के समान तुम कौन हो? साथ ही जिस प्रकार समुंदर तट पर पड़ी हुई वह मणि अपनी आभा से समीपवर्ती प्रदेश को पूर्णत: जगमगा देती है और उस शून्य स्थान में उसका प्रकाश फैल जाता है उसी प्रकार इस सागर के समीप चुपचाप बैठे, अपने अपूर्व व्यक्तित्व की आभा प्रकट करने वाले तुम कौन हो।
(2)
मधुर विश्रांत और एकांत—
जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन
और चंचल मन का आलस्य!”
व्याख्या : कवि का कहना है कि उस आगंतुक ने मनु से यह पूछा कि “तुम इस एकांत स्थान में क्यों बहुत थके हुए और आलस्य से भरे हुए बैठे हो तथा तुम्हारी शांतिपूर्ण मनोहर आकृति पर जो एक अपूर्व माधुर्य-सा दीख पड़ता हे उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो तुमने इस जगत का रहस्य भली भाँति जान लिया है। साथ ही तुम्हारी मौनता न केवल तुम्हारे बाह्य सौंदर्य का बोध कराती है बल्कि उससे यह भी स्पष्ट हो जाता है तुम्हारा हृदय करुणाशील है, अर्थात् कोमल भावनाओं से पूर्ण है और उसमें चंचलता का लेश मात्र भी नहीं है।” वास्तव में इन पंक्तियों में कवि ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि मनु वहाँ एकाग्र-चित्त हो किसी बात पर विचार कर रहे थे और उनकी मुखाकृति से व्यग्रता झलक उठती थी तथा यह भी आभास होता था कि उनके अंतरतम में कोई व्यथा छिपी हुई है।
(3)
सुना यह मनु ने मधु-गुंजार
मधुकरी का-सा जब सानंद,
किए मुख नीचा कमल समान
प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद;
व्याख्या : कवि कह रहा है कि जब उस आगंतुक ने कमल के समान कोमल मुख को झुकाए हुए भ्रमरी की मधुर गुँजार की भाँति वाणी में ये पंक्तियाँ मनु से कहीं तब मनु का हृदय स्वाभाविक ही आनंदित हो उठा। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कवि ने अभी तक इन पंक्तियों में कहीं भी आगंतुक का परिचय नहीं दिया है परंतु यहाँ इन दो पंक्तियों से यह अनुभव हो जाता है कि वह कोई सुंदर, मृदुभाषिणी, लज्जाशील, करुणामयी नारी ही है क्योंकि उसका मुख कमल के समान तथा वाणी भ्रमरी की गुँजार जैसी मधुर कहीं गई है और साथ ही कवि यह भी कहता है उसने अपना सिर नीचे झुका लिया था। इन पंक्तियों में स्वाभाविकता भी है क्योंकि जब आगंतुक के मुख को कमल माना गया है तब उसकी वाणी को भ्रमरी की गूँज मानना युक्तिसंगत ही है। कवि पुन: कहता है कि आगंतुक की वाणी मनु को उसी प्रकार अनायास निकली हुई जान पड़ी जैसा कि आदि कवि के मुख से अनायास ही मधुर छंद निकल पड़ा था।
(4)
एक झिटका-सा लगा सहर्ष,
निरखने लगे लुटे-से, कौन—
गा रहा यह सुंदर संगीत?
कुतूहल रह न सका फिर मौन!
व्याख्या : कवि कह रहा कि आगंतुक की मधुर वाणी को सुनते ही मनु के रोम-रोम में हर्ष की विद्युत लहर-सी प्रवाहित होने लगी और वे अत्यधिक प्रसन्न हुए तथा उन्हें ऐसा जान पड़ा कि मानो कोई उनके हृदयरूपी धन को लूट लिए जा रहा है। कवि के कहने का अभिप्राय यह है कि मनु को अपना हृदय उस ओर आकृष्ट होता सा जान पड़ने लगा और वे मुग्ध तथा आश्चर्यचकित हो उसी की ओर देखने लगे जिस ओर उन्हें यह वाणी सुनाई पड़ी थी। मनु का मन यह जानने को उत्सुक हो उठा कि आख़िर किस कोमल कंठ से यह वाणी निवृत हुई है पर उन्हें अपने मन की कौतूहलता अधिक देर तक दबाकर नहीं रखनी पड़ी।
(5)
और देखा वह सुंदर दृश्य
नयन का इंद्रजाल अभिराम;
कुसुम-वैभव में लता समान
चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।
व्याख्या : कवि का कहना है कि मनु को अपने सामने एक सुंदर नारी मूर्ति दिखाई दी जो कि उनके नेत्रों पर मोहक जादू-सा डाल रही थी अर्थात् उन्हें अत्यधिक आवश्यक प्रतीत हो रही थी और यही कारण है कि ज्योंही उन्होंने उसे देखा त्योंही ये उसकी ओर आकृष्ट हो गए। कवि कहता है कि उस रमणी का शरीर ऐसा जान पड़ता था कि मानो यह फूलों से पूर्ण कोई लता हो या फिर काले-काले बादलों से घिरी हुई श्वेत शुभ्र चाँदनी हो। यहाँ यह स्मरणीय है कि कवि ने जो ‘चंद्रिका से लिपटा घनश्याम’ कहा है उसका अर्थ यह नहीं कि वह बाला श्यामवर्ण की थी और इसलिए इसका अर्थ यह करना कि ‘कोई श्याम बादल जो कि चाँदनी से लिपटा हुआ हो’ उचित नहीं है। वस्तुत: कवि यह कहना चाहता है कि वह रमणी नीला परिधान धारण किए हुए थी और इसलिए यहाँ नीले वस्त्र की उपमा मेघ से तथा उसके गौर-वर्ण की उपमा चाँदनी से दी गई है।
(6)
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
एक लंबी काया, उन्मुक्त;
मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल
सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।
व्याख्या : कवि कह रहा है कि रमणी का बाह्य तन उसके हृदय की ही अनुकृति था अर्थात् उसका शरीर बाहर से जितना मनोहर जान पड़ता था उतना ही उसका हृदय भी उदारता से ओतप्रोत था। कवि का कहना है कि यदि उस रमणी का शरीर लंबा एवं कोमल था तो हृदय भी विशाल और सुकुमार ही था अर्थात् उसका बाह्य तन और अंतर्मन दोनों ही सरल एवम् संकीर्णता रहित थे। कवि कह रहा है कि जिस प्रकार कोई लघु शाल वृक्ष सुंदर सुरभि युक्त पवन के झोकों से हिलारें-सी लेता हमेशा प्रिय लगता है उसी प्रकार उस बाला के शरीर से भी अत्यंत भीनी-भीनी गंध आ रही थी। वह लावण्यता की प्रतिमा सहज-सी प्रिय जान पड़ती थी। कवि ने इन पंक्तियों में उस रमणी को अपूर्व रूपवती कहा है और ‘मधु पवन क्रीडित’ कहने से संभवत: उसका अभिप्राय यही है कि उस रमणी के शरीर से समुधुर वायु अठखेलियाँ सी कर रही है। साथ ही यह भी कह सकते हैं कि उसके हृदय में मधुर भावनाएँ विद्यमान थी और वह अनेक उत्तम गुणों से पूर्ण भी जान पड़ती थी।
(7)
मसृण गांधार देश के, नील
रोम वाले मेघों के चर्म,
ढँक रहे थे उसका वपु कांत
बन रहा था वह कोम वर्म।
व्याख्या : कवि का कहना है कि उस नारी का कोमल सुंदर शरीर गांधार देश के चिकने नीले रोम वाले भेड़ो के चमड़े से आच्छादित था अर्थात् युवती ने जो वस्त्र अपने शरीर पर धारण किया था वह गांधार देश की नीले रोयें वाली भेड़ों के चिकने चमड़े से बना था। इस प्रकार वह वस्त्र उसके सुंदर शरीर पर सुकोमल आवरण के समान था।
(8)
नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग;
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।
व्याख्या : कवि मनु से प्रश्न करने वाली आगंतुक रमणी (श्रद्धा) का रूप वर्णन करते हुए कह रहा है कि उस रमणी के नीले वस्त्र में से उसका सुकुमार एवं सुंदर शरीर कहीं खुला हुआ था अर्थात् परिधान युक्त स्थानों के अतिरिक्त उसके शरीर के अन्य अंग खुले हुए थे और वे ऐसे जान पड़ते थे कि मिनो काले बादलों रूपी वन में गुलाबी रंग के बिजली के फूल खिले हुए हों। इन पंक्तियों में कवि ने नीले परिधान के लिए बादलों और रमणी के अधखुले अंगों के लिए बिजली के फूल नामक उपमाओं का प्रयोग कर यह स्पष्ट करना चाहा कि उसका शरीर अपूर्व सौंदर्यशाली या और उसका वर्ण गुलाबी रंग का था।
(9)
आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम—
बीच जब घिरते हों घन श्याम;
अरुण रवि-मंडल उनको भेद
दिखाई देता हो छविधाम।
व्याख्या : कवि अब उस बाला के मुख का वर्णन करते हुए कहता है कि उसका मुख इतना अधिक सुंदर था कि उसका वर्णन करना सहज नहीं है। इस प्रकार कवि प्रारंभ में ही यह स्वीकार कर लेता है कि उस रमणी अर्थात् श्रद्धा के मुख की तुलना किसी भी पदार्थ से नहीं की जा सकती और उसकी सुंदरता अवर्णनीय है। कवि कह रहा है कि उस रमणी के मुख की शोभा वैसी ही थी जैसी की संध्या के समय आकाश के पश्चिमी भाग में काले-काले बादलों से घिरे हुए लाल सूर्यमंडल की रहती है।
(10)
या कि, नव इंद्र नील लघु शृंग
फोड़ कर धधक रही हो कांत;
एक लघु ज्वालामुखी अचेत
माधवी रजनी में अश्रांत।
व्याख्या : कवि श्रद्धा के मुख का वर्णन करते हुए कहता है कि जिस प्रकार नवीन नीलम के छोटे से पहाड़ की चोटी पर वसंत की रात में ज्वालामुखी की लपटें अंदर ही अंदर धधकती रहती हैं उसी प्रकार उसका मुख भी शोभायमान है। चूँकि आगंतुक रमणी अभी युवा ही थी और नीला परिधान पहने हुए थी अत: कवि ने यहाँ लघु आकार के नीलम की कल्पना की है। यहाँ यह स्मरणीय है कि पुराने नीलम में धब्बे पड़ जाते हैं और वह उतना आकर्षक नहीं जान पड़ता इसलिए कवि ने यहाँ ‘नव इंद्रनील’ शब्द का प्रयोग किया है। साथ ही यह उस रमणी की यौवनावस्था ही है अत: उसे वसंत की रात्रि में धधकता हुआ ज्वालामुखी कहा गया है और उसकी मुख कांति को ज्वालामुखी की लपटें माना गया है परंतु पूर्णानुराग की भावना से रहित होने के कारण उसके अंतर के ज्वालामुखी को उचित माना गया है |
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