अब तो पथ यही है ( दुष्यंत कुमार )

दुष्यंत कुमार की कविता ‘अब तो पथ यही है’ निराशा और मजबूरी की भावना को दर्शाती है, जहाँ व्यक्ति जीवन की सच्चाइयों को स्वीकार कर लेता है। इस कविता में कहा गया है कि ज्वार का आवेग अब धीमा हो चला है और आकाश से भी कोई उम्मीद नहीं बची है। जब जीवन की परिस्थितियों से लड़ने का बल समाप्त हो जाता है, तो यही एकमात्र मार्ग बचता है। 

यह कविता दुष्यंत कुमार के प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ में संकलित है, जो वर्ष 1975 में प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह उस समय की सामाजिक और राजनीतिक निराशा को दर्शाते हुए, हिंदी साहित्य में ग़ज़ल को एक नई पहचान देने वाला माना जाता है। यह कविता बताती है कि जब आशा की किरणें धुँधली पड़ जाती हैं, तो मनुष्य सब कुछ नियति के हाथों में छोड़कर वर्तमान को स्वीकार कर लेता है। 

(1)

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है |

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |

प्रसंग — “अब तो पथ यही है” दुष्यंत कुमार के काव्य-संग्रह “साये में धूप” (1975) में संकलित एक चर्चित कविता है। यह कविता आधुनिक हिंदी कविता, विशेष रूप से ग़ज़ल की विधा में लिखी गई उनकी रचनाओं में से एक महत्वपूर्ण रचना है। दुष्यंत कुमार ने अपनी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा, सामाजिक विसंगतियों, व्यवस्था के प्रति क्षोभ और एक नई उम्मीद की खोज को बहुत ही मार्मिक और सशक्त ढंग से व्यक्त किया है। यह कविता भी उन्हीं भावनाओं का प्रतिबिंब है।

व्याख्या — कविता के इस अंश में दुष्यंत कुमार ने एक ऐसे व्यक्ति की मानसिक दशा को स्वर दिया है, जो लंबे समय तक जीवन के उतार-चढ़ाव, संघर्ष और उम्मीदों के बीच झूलता रहा, लेकिन अब उसने यथार्थ को स्वीकार कर लिया है। कवि कहता है कि यह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि यथार्थ का बोध और विवेक पूर्ण स्वीकार है। अब जब जीवन ने अपने मार्ग को पहचान लिया है, तो वहीं चलना उसकी नियति बन गई है। कवि कहते हैं कि जो जोश और आवेग पहले जीवन में था, वह अब थमता जा रहा है। यह भावनाओं के स्थिरीकरण और व्यावहारिक सोच की ओर संकेत करता है।

कवि के अनुसार शिला के हटने की संभावना न भी हो, तो भी थोड़ी-सी नमी रास्ते में आ चुकी है जो आशा और आगे बढ़ने का संकेत देती है। कवि अब किसी अलौकिक सहायता या चमत्कार की अपेक्षा नहीं करता। वह जीवन के यथार्थ को आत्मसात कर चुका है और उसी मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प करता है।

(2)

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है |

प्रसंग — पूर्ववत |

व्याख्या — इस काव्यांश में दुष्यन्त कुमार जीवन की नाजुकता और उसकी अस्थिरता को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि जीवन एक कांच के घड़े की तरह है-बहुत सुंदर लेकिन बहुत नाजुक। किसी भी क्षण यह फूट सकता है यानी जीवन का अंत या बड़ा परिवर्तन अचानक हो सकता है। कवि यह दर्शाता है कि हमारा जीवन कोई महान आख्यान नहीं, बल्कि एक साधारण कथा है, जो कभी भी अधूरी रह सकती है। इसलिए किसी पूर्णता की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है।

कवि आगे कहता है कि जीवन में कभी आशा, आलोक या आदर्शों से किया गया कोई भावनात्मक समझौता भी टूट सकता है। जब व्यक्ति आदर्शों से समझौता करता है और वह भी टिक नहीं पाता तब वह पूरी तरह अकेला और टूट चुका होता है।

इस अवतरण की अन्तिम पंक्ति में कवि किस्मत की बेरुखी की ओर संकेत करता है। जब सारे ग्रह-नक्षत्र भी साथ न दें, तब कोई मार्गदर्शक नहीं रह जाता। ऐसे में केवल एक ही रास्ता बचता है, वह है — आगे बढ़ते जाना। इसलिए कवि निष्कर्ष देता है कि अब तो केवल यही रास्ता है।

(3)

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |

प्रसंग — पूर्ववत |

व्याख्या — दुष्यन्त कुमार इस काव्यांश में जीवन के भीतरी संघर्षो को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। ‘ यह लड़ाई, जो कि अपने आप से मैंने लड़ी है’ यह पंक्ति बताती है कि बाहरी संघर्षों से बड़ा युद्ध अपने ही मन, भावनाओं, भय और असमंजस से होता है। आत्म-संघर्ष सबसे जटिल होता है और कवि ने यह युद्ध स्वयं से लड़कर जीता है। कवि एक व्यंग्यात्मक शैली में संकेत करते हैं कि समाज के कुछ लोग केवल पुस्तकें पढ़कर ही पीड़ा का ज्ञान पाते हैं, जबकि उन्होंने इसे जिया है। कवि ने इस घुटन और यातना को अपने जीवन का यथार्थ माना है।

दृढ़ इरादों से पहाड़ी पर चढ़ना संघर्ष की चरम परिणति है। शारीरिक कठिनाइयों से अधिक मानसिक दृढ़ता और इच्छाशक्ति ही मनुष्य को ऊँचाइयों तक ले जाती है। अंत में कवि कहते हैं कि जो आज केवल खिड़‌कियाँ हैं, सीमित साधन हैं, वे ही भविष्य में विशाल द्वार बन जाएँगे। इसका आशय है कि आज की छोटी सफलताएँ कल बड़े अवसरों का मार्ग खोलेंगी। इसलिए अब जीवन के इसी पथ पर चलना ही एकमात्र विकल्प है। तभी तो कवि कहता है कि अब तो पथ यही है अर्थात यही रस्ता श्रेयस्कर है |

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